
लेखक -डॉ प्रदीपसिंह राव
दुनिया के सबसे बड़े स्वयं सेवक संगठन ,राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आर एस एस) की स्थापना आज से सौ वर्ष पूर्व 27सितंबर 1925 में हुई थी।इसके जनक डॉ केशव हेडगेवार ने विजय दशमी को स्थापना करते हुए संघ को मात्र भूमि की सेवा के उद्देश्य के लिए खड़ा किया।अंग्रेजी हुकूमत में भी राष्ट्र भक्तों की इस सेना ने कभी अपने स्वाभिमान को झुकने न दिया।किसी को भी इतनी उम्मीद न थी कि यह संगठन एक दिन जनसंघ और फिर विश्व की सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी की पोषक बन जाएगी।1975 में 50वर्ष पूर्ण होने पर देश आपातकाल में जकड़ गया,और संघ पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया।बाद मे जनता पार्टी के साथ संघ का राजनीतीकरण हो गया।मोरारजी देसाई और फिर अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने संघ के आदर्शों के पथ पर चलते हुए भारतीय जनता पार्टी को कांग्रेस का सशक्त प्रतिद्वंद्वी बना लिया। 1980में सिर्फ दो संसद सदस्यों की इस पार्टी ने 2014 तक प्रधानमंत्री मोदी के साथ शिखर यात्रा शुरू कर दी जो आज देशवार दुनिया में राष्ट्रवादी राजनीति के लिए विख्यात है।
आज पूरे भारत में ,55 हजार से अधिक संघ की शाखाएं हैं,जो राष्ट्र भक्ति की धमनियां हैं,इनमें संस्कारों,संयम और अनुशासन का रक्त प्रवाहित होता है। केंद्र से लेकर ग्राम और शाखा तक के व्यवस्थित संगठन उम्दा प्रबंधन है।बच्चों से लेकर भी व्यवृद्ध तक शाखा के सदस्य हैं जिनकी संख्या लाखों में हैं।प्रभात शाखा, सायं शाखा,रात्रि शाखा,मिलन और संघ मंडली के माध्यम से गतिविधियां चलती हैं।श्रीसंघ संचालक सर्वोच्च पद होता है,जिसे इन दिनों मोहन भागवत बखूबी निभाते हुए राष्ट्र भक्ति की अलख जगा रहे हैं।आज सदस्यों की संख्यालगभग एक करोड़ के आसपास है।

योग,खेल,बौद्धिक चर्चा ,राष्ट्रीय मुद्दों पर मंथन,संघ का जनसंपर्क,हिन्दू धर्म की व्याख्या,सामाजिक समरसता जैसे बहुआयामी कार्य हैं जिसे देश विदेश के कोने कोने तक स्वेच्छा से लोग संघ को मातृ सेवा का मंच बना रहे हैं। गुरु जी गोल्वरकर, बल साहेब देवरस, राजेंद्र सिंह,रज्जू भैया, सुदर्शन जी जैसे महान सरसंघ संचालकों के सैद्धांतिक आदर्शों पर खड़ी संस्था के आज 200से अधिक संगठन अपना कर्तव्य निभा रहे हैं।भाजपा, संस्कार भारती,भारतीय किसान संघ,भारतीय मजदूर संघ,सेवा भर्ती,अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद,विश्व हिंदू परिषद,सरस्वती शिशु मंदिर,विद्या भारती,दुर्गा वाहिनी, बजरंग दल,वनवासी कल्याण परिषद जैसी अनेक शाखाएं संघ के ध्येय वाक्य, “मातृ भूमि के लिए निस्वार्थ सेवा,”को सार्थक कर रहे हैं।आज संघ के शताब्दी वर्ष मे घर घर में संस्कारों का संकल्प ले कर राष्ट्र की इस सबसे सुसंस्कारी संस्था के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना चाहिए जिसने सहस्त्र वर्ष तक भारत को स्वाभिमान के साथ अक्षुण्ण रखा है।
